परामर्शी


1. एकीकृत काशंग जल विद्युत परियोजना (243 मेगावाट) हिमाचल प्रदेश  हेतु पर्यावरण प्रभाव  आकलन पर अध्ययन तथा पर्यावरण प्रबंधन योजना: :

हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला ने काशंग जल विद्युत परियोजना (243 मेगावाट) के पर्यावरण प्रभाव आकलन पर अध्ययन कार्य किया तथा अध्ययन पर आधारित पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार की । पर्यावरण प्रभाव आकलन तथा पर्यावरण प्रबंधन योजना, भारत सरकार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा विधिवत् अनुमोदित की गई । प्रस्तावित एकीकृत काशंग परियोजना के विकास के चार विशिष्ट चरण हैं:

 

  • चरण-1. इस चरण में सतलुज के दाहिने किनारे पर पवारी गांव के पास भूतल से 2829 मीटर पर स्थित भूमिगत जलविद्युत घर में काशंग नदी की धारा को मोड़ना तथा लगभग 830 मीटर के किनारे का विकास करना निहित है।

  • चरण-2.इसमें भूतल से 2870 मीटर पर एक भूमिगत जल संचालक योजना में कीरंग नदी की धारा को मोड़ना एवं उसे चरण-1 जल संचालक योजना के ऊपर से ले जाना निहित है।

  • चरण-3. इसमें काशंग चरण- 1 जलविद्युत घर में तैयार 820 मीटर किनारे के ऊपर कीरंग के जल को प्रयोग करके चरण-1 जलविद्युत घर की उत्पादन क्षमता का संवर्धन करना निहित है।

  • चरण-4. इसमें चरण-2 के विचलन स्थल के धारा प्रतिकूल को कीरंग नदी में मिलाकर संभावित क्षमता को काम में लाने की कमोबेश स्वतंत्र योजना निहित है। इस योजना में कीरंग खड्ड के दाहिने किनारे पर स्थित एक भूमिगत जलविद्युत घर में विद्युत तैयार करने के लिए लगभग 300 मीटर के एक किनारे का प्रयोग किया जाएगा।

एकीकृत काशंग जल विद्युत परियोजना (243 MW)

पर्यावरण प्रभाव आकलन पर्यावरण के विभिन्न आधार रेखा पैरामीटर के अध्ययन में भूमि जलवायु कोलाहल वनस्पति जंतुसमूह व समाजार्थिक अध्ययन सम्मिलित हैं। इन पैरामीटर का समेकन जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के कारण सकारात्मक तथा नकारात्मक प्रभावों का पूर्ण अवबोधन कराता है। प्रभाव के पूर्ण पूर्वानुमेय के लिए चरण 2 व 3 के साथ चरण 1 संघटित करते हुए के.के लिंक सुरंग के केंद्र से 10 कि.मी. व्यास को अध्ययन क्षेत्र माना गया और उसमें सभी महत्वपूर्ण परियोजना घटकों जैसे चरण 1(डोलो दोगरी) चरण 2 (लापो) चरण 4 (टोक्टू) चरण 1 तथा चरण 4 के भूमिगत जलविद्युत घर तय किए गए और खाई बांध स्थलों के ऊपर काशंग व कीरंग खड्ड के खुले जलनिकास जलक्षेत्र के साथ सतलुज नदी में छोड़ी गई है। यहां यह उल्लेखनीय है कि एकीकृत परियोजना के चरण 1 चरण 2 तथा चरण 4 ही काशंग व कीरंग खड्ड में एकमात्र जलविद्युत परियोजना हैं और चरण 4 के लिए अंतग्रहण बिंदुओं के अलावा चरण 1 व चरण 4 के ऊपरी धारा या निचली धारा में कोई अन्य जलविद्युत परियोजना नहीं हैं जो एकीकृत योजना का भी एक भाग है। उध्र्व बिंदू खाई बांध के माध्यम से धारा के अपवर्तन में भी कोई जलमग्न क्षेत्र नहीं है। पूर्व में किये गए पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन के संबंध में पहले से किए गए आधार रेखा अध्ययन को देखते हुए 15-11-2002 को जिस निकासी (चरण 1) की अनुमति दी गई थी] उसका अगला आधार रेखा अध्ययन मार्च 2008 से जुलाई 2008 के दौरान शीत एवं पूर्व-मानसून ऋतु के लिए किया गया था जैसाकि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पत्रांक जे-12011/81/2007-आईए.1 दिनांक 12-12-2007 के द्वारा निर्धारित किए गए TOR के पैरा 4.1 में दिया गया है।

पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अध्ययन के आधार पर एक विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना जिसमें जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना, पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास योजना, प्रतिपूरक वनीकरण योजना, हरित-पट्टी विकास योजना, वन्यजीव प्रबंधन विकास योजना, एवं जैव-विविधता संरक्षण योजना, खाद प्रबंधन योजना, खदान स्थलों के लिए पुनःसंग्रहण योजना, भूदृष्य पुनःसंग्रहण योजना, स्वास्थ्य प्रबंधन योजना, आर्थिक सहायता प्राप्त इंधन के लिए प्रावधान, ठोस कचरा प्रबंधन योजना, नदिया व नहरो में मतस्य विकाय योजना, आर्थिक आकलन संघात, व निष्कर्षों का सारांश सम्मिलित है ।

पर्यावरण संधात आकलन पर आधारित निम्नलिखित संस्तुतियां बनाई गई है:>

  • वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 व पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत राज्य प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण बोर्ड से अपेक्षित अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होगा ।

  • परियोजना प्रस्तावक को पर्यावरण से संबंधित नवीनतम कानून कायदों से अवगत होना होगा और उनसे संबंधित परिवर्तनों के बारे में तत्पर व समय पर कार्यवाही करनी होगी।

  • निर्माण अवधि के दौरान व्यवस्थित तरीके से आवधिक लेखा-परीक्षा व रिर्पोर्टंग को अपनाते हुए ठेकेदार द्वारा प्रबंधन योजना के कार्यान्वयन के लिए कठोरता से अनुपालना सुनिश्चित करनी होगी।

  • परियोजना प्रस्तावक व उनके प्रतिनिधियों को सदैव प्रभावशाली लोक परामर्श के लिए रणनीति विकसित करने का सुझाव दिया जाता है।

2. पंडोह डैम से लारजी डैम, सुंदरनगर, जिला मंडी, हिमाचल प्रदेश. तक ब्यास सतलुज लिंक परियोजना के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना की तैयारी :


  • स्थानीय लोगों के द्वारा प्रदर्शित सम्बद्धता को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय हिमाचल प्रदेश ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड बनाम हिमाचल प्रदेश पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मामले में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार, को एक सही जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना विकसित करने का निर्देश दिया। माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों के निर्वहन में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2004 के दौरान सिल्ट प्रबंधन एवं भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड से संबंधित व्यास सतलुज लिंक परियोजना के संबद्ध मसलों पर सुझावों के लिए कार्य योजना तैयार करने हेतु विषेषज्ञ समिति का गठन किया। जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना के विकास के लिए भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड ने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के साथ मंत्रणा की। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला जो भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद का एक क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान है ने सुंदरनगर में 19.02.2008 को विषेषज्ञ समिति के समक्ष एक प्रस्तुतिदी जिससे इस कार्य के लिए टीओआर का विकास हुआ और हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान व भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के मध्य व्यास नदी व इसकी सहयोगियों के लिए पंडोहडैम के उपरी धारा से लारजी डैम तक ब्यास सतलुजलिंक के जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना तैयार करने के लिए दिनांक 03/06/2008 को हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान व भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के मध्य समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू) हस्ताक्षरित हुआ। परामर्श की कुल कीमत 17.02 लाख रूपए थी।

हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान व इसके सहयोगियों द्वारा जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना के विकास के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक कार्य-प्रणालियों के प्रयोग से विस्तृत फील्ड कार्य किया गया। ड्राफ्ट योजना की विस्तृत चर्चा दिनांक 09/08/2008 को भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के अधिकारियों, मुख्य अभियंता, बी.बी.एम.बी के अन्य पदाधिकारियों, हिमाचल प्रदेश वन विभाग के वन अधिकारियों व हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान के विषेषज्ञों के साथ की गई। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के प्राधिकारियों के प्रस्तुतिकरण व विचार विमर्श के बाद नई दिल्ली में दिनांक 10/06/2009 को केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विषेषज्ञ समिति के समक्ष एक प्रस्तुति दी । समिति ने जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन परियोजना की प्रशंसा की तथा छोटे सुझावों के साथ इसे अनुमोदित कर दिया जिसे इस अंतिम जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन परियोजना में समाहित किया गया।

जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन परियोजना का सारांश:

व्यास नदी, रोहतांग पास के समीप व्यास कुंड से 4085 मी. ऊपर रावी स्रोत के साथ 4062 मी. ऊपर पीर-पंजाल रेंज के दक्षिणी छोर से निकलती है। 460 कि.मी. गुजरने के बाद यह हरिक में सतलुज नदी में समाती है। यह नदी हिंदू घाटी की अन्य बड़ी नदियों की तुलना में कुछ छोटी है। परन्तु समस्त भारतीय क्षेत्र में अवस्थित है और मंडी में 15,800 एम.सी.एम. का वार्षिक बहाव लाती है और इसका कुल जलग्रहण क्षेत्र 20303 वर्ग कि.मी. है। पंडोह डैम व लारजी डैम पर व्यास का कुल जलग्रहण क्षेत्र क्रमश: 5278 वर्ग कि.मी. तथा 4921 वर्ग कि.मी. आकलित किया गया है। पंडोह में 5278 वर्ग कि.मी. के कुल जलग्रहण क्षेत्र में से 780 वर्ग कि.मी. हिमाच्छादित क्षेत्र है।

प्राय: जल अधिग्रहण क्षेत्र उपचार योजना मृदा और जल संरक्षण के मुख्य उपायों को ध्यान में रखते हुए तैयार किये जाते है यह योजना भी पंडोह बांध का जलग्रहण क्षेत्र जो भूमि कटाव का मुख्य केंद्र है, से बहुमूल्य मिटटी के कटाव को रोकने के लिए तैयार की गयी है | मृदा संरक्षण चिन्हित किये गये क्षेत्र स्थलीय परिस्थिथियो व SYI पद्धति पर आधारित है | यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां विभिन्न मृदा संरक्षण के उपायों का प्रस्ताव किया गया है, जमीनी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए प्राथमिकता के आधार पर किया गया।

संरक्षण उपायों की प्रभावशीलता अवसादन बोझ में कमी, धाराओं की तलछट भार में कमी तथा उपलब्ध भूमि पर उत्पादन में वृद्धि से किया जा सकता है । उपचारित उप-जलोस्तरण क्षेत्र को विभिन्न मानवजनित कारणों जैसे, सडकों की खुदाई, जंगलों में आग लगना, जरूरत से अधिक चराई तथा घासनियों में आग लगना इत्यादि परिघटनाओ में उत्पन अवसाधन बोझ को कम करने के लिए स्थापित किया जाता है

अवसाधन प्रवाह की दर – चूली नाला, गुलशन गढ़ तथा बाखली खड्ड जिसके उप-जलोस्तरण क्षेत्र में भूमि कटाव तथा जल संरक्षण कार्य, जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजना के अंतर्गत प्रस्तावित है, को एकीकृत भू/मिट्टी संरक्षण के उपायों के कार्यान्वयन के साथ कम करने को बाध्य है उपरोक्त कार्य इस परियोजन के स्वाभाविक परिणामों से ही चलेंगे | कार्यों की सफलता, निम्नलिखितरोकने पैराग्राफ में वर्णित कारको पर निर्भर है:

कृषि पद्धतियों में सुधार:

दोषपूर्ण कृषि पद्धतियों ने उपजाऊ कृषि भूमि के कटाव को जन्म दिया है । कृषि सुधार प्रथाओं के रूप में खेती फसल चक्र, स्ट्रिप खेती युक्त इस तरह के उपायों, फसलों और पलवार आमतौर पर खेत आपरेशन के एक भाग के रूप में हवा और पानी के कटाव के खिलाफ मिट्टी की रक्षा के लिए किया जाता है । जनता में जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से स्थानीय किसानों को उनके लाभ के लिए इस तरह के व्यवहार को अपनाने के लिए समझाया जाना चाहिए।

विकास कार्य:

बुनियादी ढांचे के विकास में सड़कों, भवनों आदि का निर्माण, जो भूमि के माहौल का सीधा हस्तक्षेप करता है, एक वैज्ञानिक तरीके से बाहर किया जाना चाहिए और परिसंपत्ति एक टिकाऊ पर्यावरण के अनुकूल तरीके से बनाया जाना चाहिए। खुदाई की सामग्री अधिकतम करने के लिए जहां भी संभव हो, इस्तेमाल किया जाना चाहिए और अधिशेष सामग्री की खुदाई ठीक से प्रबंधित कचरा स्थल में व्यवस्थित की जानी चाहिए। अस्थिर खुदाई की ढलानों को ठीक से बनाए रखा जाना चाहिए और जमीन की सतह वनस्पति बढ़ रही द्वारा स्थिर हो जाना चाहिए। यह देखा गया है कि सड़क खुदाई से गंदगी रोलिंग सामग्री है, जो गली गठन / कटाव पैदा कर रही है के रूप में निपटाया जा रहा है। सभी अच्छे काम कैट योजना को लागू करने के द्वारा किया अर्थहीन हो तलछट उत्पादन के अधिक स्रोतों के विकास के नाम पर बनाई गई हैं यदि जाएगा। कैट योजना के कार्यान्वयन की सफलता के ज्यादातर क्षेत्र में अनुकूल गतिविधियां पर्यावरण पर निर्भर है।

खनन:

खनन से उत्पन्न होने वाले कचरे को आमतौर पर ऐसे स्थान पर फैंका जाता है जहाँ भूमि कटाव की अधिक सम्भावना हो I इसलिए जलग्रहण क्षेत्र में न्य खनन पत्ता देने से पहले, पट्टेदार को इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि खनन से उत्पन्न कचरे को स्थिर ढेर के रुपे में स्थापित किया जाए तथा खनन से उत्पन्न कचरे की ऊपरी साथ पर वनस्पति, जैव-प्रोद्योगिकी तकनीक की सहायता से उत्पन्न की जानी चाहिए I नै खदानों हेतु पट्टा पंडोह डैम जलग्रहण क्षेत्र की अनुश्रवण समिति की संतुति के पश्चात् प्रदान किया जाए

उप-जलविभाजक बीआईसी 6(4) जिसके माध्यम से बाखली खडड निकासी करती है उसका 212॰89 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में से 628 वर्ग किमी क्षेत्र पंडोह डैम का खुला निकासी जलग्रहण क्षेत्र है। बाखली खडड का उदगम शिकारी देवी से होता है और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में इसकी कई सहायक नदियां हैं। पटिकरी जलविद्युत परियोजना (15 मेगावाट) बाखली खडड का उपरी विकास है और इसलिए इसका जलग्रहण पंडोह डैम के खुले निकास जलग्रहण में शामिल नहीं किया गया है। परियोजना प्रस्तावक द्वारा एक अलग जलग्रहण परियोजना यथा पटिकरी पावर प्राइवेट लिमिटेड निरूपित की गई है।

बाखली खडड में एक स्थल पर तलछट अन्तःप्रवाह की देखरेख की जा रही है। जो व्यास के साथ इसके सम्मिलन से 2॰5 कि.मी. के लगभग है। अतः औसत वार्षिक तलछट दर पटिकरी पावर प्रोजैक्ट के जलग्रहण में उत्पादित तलछट भी शामिल करती है। पटिकरी परियोजना के अन्तर्गत क्रियान्वित जल एवं मृदा संरक्षण पैमाने की प्रभावषीलता बाखली खडड में समस्त तलछट प्रवाह का निष्चित रूप से धारक होगी जिसके लिए निचली जलग्रहण (62॰8 वर्ग किमी) परियोजना बहुत घने कटाव श्रेणी के अन्तर्गत 500 है. के जलग्रहण परियोजना के प्रतिपादन को आवशयक बनाती है। यहां पर यह नोट करना भी महत्वपूर्ण है कि पटिकरी पावर प्रोजैक्ट के कैट परियोजना के अन्तर्गत वनरोपण तथा सिल्वी-चारागाही विकास केवल क्रमषः 60 है. तथा 30 है. में ही प्रस्तावित है। जबकि इसका जलग्रहण 217 वर्ग किमी है।

पंडोह डैम का उपरी विकास:

पंडोह डैम के व्यास नदी की ऊपरी धारा के बेसिन में कई जल विद्युत परियोजनाएं या तो निर्मित की गई हैं या निर्माणाधीन हैं या प्रस्तावित हैं। व्यास और इसकी सहायक नदियों के ऐसे सभी उपरी विकास कार्य की उनके खुले निकासी जलग्रहण के लिए अलग कैट परियोजना होगी। यद्यपि योजनाएं सामान्यतः आर-ओ-आर योजनाएं हैं जिनकी नगण्य ट्रैपिंग योग्यता है और इन नदियों विषेशकर व्यास की तलछट उत्पादन दर प्रस्तावित योजनाओं के कार्यान्वयन के बाद घट जाएगी। इस प्रकार पंडोह डैम जलाश्य मे सिल्ट प्रवाह नदी घाटी में विद्युत के सोपानी जलप्रपात विकास के साथ घटने की संभावना है। अतः पंडोह डैम के जलाश्य में संपूर्ण तलछट प्रवाह निर्दिष्ट क्षेत्र के लिए जलग्रहण उपचार क्षेत्र योजना के कार्यान्वयन के साथ निश्चित निष्चित रूप से घटेगा जो सीधा जलाश्य में जाता है।

विकास कार्य :

संरचना विकास कार्य जैसे सड़को का निर्माण, भवन निर्माण, इत्यादि जो सीधे रूप से भूमि पर्यावरण के सीधे हस्तक्षेप से संबंधित हैं को वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिए तथा परिसम्पत्ति को धारणीय पारिस्थितक मैत्री के तौर पर विकसित करना चाहिए। उत्खनित सामग्री को जहां तक संभव हो आप्टिमम के तौर पर प्रयोग किया जाना चाहिए। तथा अधिशेष उत्खनित सामग्री को सुव्यवस्थित क्षेपण स्थलों में सुरक्षित रखना चाहिए। अस्थायी ढलानों को सुरक्षित करना चाहिए तथा भू-सतह वनस्पति रोपण द्वारा स्थायी होनी चाहिए। यह देखा गया है कि मार्ग उत्खनन से निकला कूड़ा-कर्कट रोलिंग सामग्री के तौर पर निपटाया जा रहा है, जिससे भूमि-कटाव पैदा हो रहा है। जलग्रहण उपचार क्षेत्र परियोजना द्वारा किया गया कार्य अर्थहीन हो जाएगा यदि तलछट उत्पादन के अधिक स्रोतों को विकास के नाम पर सृजित किया जाएगा। जलग्रहण उपचार योजना के कार्यान्वयन की सफलता क्षेत्र में अधिकतर इको-फै्रंडली गतिविधियों पर निर्भर है।

3. फीना सिंह मध्यम सिंचाई प्रोजैक्ट नूरपुर जिला कांगड़ा के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन योजना की तैयारी: :

कार्यकारी अभियंता सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य विभाग नूरपुर जिला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश ने फीना सिंह मध्यम सिंचाई प्राजैक्ट के लिए कैट योजना की तैयारी का कार्य रू. 15 लाख की कुल कीमत पर मई 2010 के दौरान हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला को सौंपा गया । हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान ने मै. मेनटेक कंस्लटेंट नई दिल्ली के सहयोग से उपरोक्त कार्य लिया और समयबद्ध तरीके से सौंपा गया कार्य पूरा किया और हिमाचल प्रदेश वन विभाग के अनुमोदन के पशचात 21॰02॰2011 को परामर्शी संगठन को अंतिम जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजना की 15 प्रतियां प्रदान कर दी है

चक्की खड्ड के दाहिने ओर स्थित सड़क के ऊपर लोहरू नामक स्थान का मिट्टी कटाव का नजदीकी परिदृश्य

कलाम खड्ड के दाहिने छोर, लाहरू बीट, में भूमि कटाव कर दृश्य

जलग्रहण क्षेत्र योजना का सारांश

फिना सिंह मध्यम सिंचाई परियोजना चक्की तथा कलाम खड्डों के जल को 22 मीटर ऊंची भंडारण तथा विपथन बांध का निर्माण कर इन खड्डों के जल के दोहन करने पर विचार किया गया I 849 मीटर लम्बी फीडर चैनल के जलाशय में प्रवेश से बांध को चक्की खड्ड में बनाया जाना है I उपरोक्त खड्डों को 1.395 कि.मी. लम्बी सुरंग से मुख्य नहर में जोड़ा जाएगा तथा 4.29 कि.मी. लम्बी लिफ्ट जिसे गुरुत्वाकर्षण प्रदान करने के उद्देश्य से क्रमश: 2881 हेक्टेयर और 1144 हेक्टेयर, जिसका कुल योग 4025 CCA है, नूरपुर-सैडवान क्षेत्र, तहसील नूरपुर जिला काँगड़ा के लगभग 60 गाँवों को सिचाईं सुविधा प्रदान करेगा I मुख्य नहर एक आकार नहर होगी जिसमें खरीफ और रबी की फसल के दौरान शत-प्रतिशत सिचाईं की सुविधा तथा 10.5 प्रतिशत जेड फसल (हमदानी) के दौरान 3.27 कयुमैक्स अधिकृत जल-प्रवाह सुनिश्चित किया जाएगा I इस परियोजा की अनुमानित लागत सितम्बर 2007 के आकलन के अनुसार रूपये 147.15 करोड़ आंकी गई है I प्रति सकल सिचाईं रूपये 1.76 लाख प्रति हेक्टेयर आंकी गई है तथा लाभ लागत अनुपात 1.70:1 मूल्यांकित किया गया है I परियोजना का निर्माण कार्य दो चरणों में किया जाएगा जिसे 4 से 5 वर्षो में पूर्ण किया जाएगा I प्रस्तावित परियोजना के जलग्रहण क्षेत्र, भंडारण सह मोड़ बांध स्थल पर, चक्की खड्ड, बलूड खड्ड और कलाम खड्ड जिसका पानी परियोजना हेतु पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए शामिल किया जाएगा । इस परियोजना का अनुमानित क्षेत्र 155.85 स्क्वायर मीटर है तथा मुख्य रूप से वर्षा सिंचित धौलाधार के शिखर पर अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों के अलावा 2772 मीटर समुद्र तल से उत्तर और उत्तर-पूर्व की ऊंचाई से 2441 मीटर ऊपर है, जो सर्दियों के दौरान बर्फ गिरने का अनुभव करने के लिए एक पर्वतमाला है। बांध स्थल के ऊपर जलग्रहण के आकार का है और चक्की खड्ड, जो अपने आप में ब्यास बेसिन की एक उप-बेसिन है के ऊपरी जलग्रहण का गठन किया गया है

इस परियोजना के अंतर्गत जलग्रहण क्षेत्र के उपचार कार्यों हेतु अलग से प्रावधान किया गया है, जिस में, पर्यावरण सेवाएं प्रदान करने के लिए समर्थन बुनियादी ढांचे की लागत, ईंधन की लकड़ी की बचत उपकरणों, प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रमों, उपयोगकर्ता समूहों, प्रलेखन की लामबंदी, निगरानी और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए प्रावधान, प्रावधान के कार्यान्वयन, भूमि में नमी बनाये रखने के लिए प्रावधान, वन सरोवर और जल संचयन संरचना, वन्यजीव प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण योजना, क्षमता निर्माण, आदि के निर्माण के लिए प्रावधान किया गया है

4.जम्मू प्रांत के गैर-वन भूमियों पर उगे खैर वृक्षों का आकलनः :

प्रधान मुख्य वन संरक्षक, जम्मू-कश्मीर वन विभाग, ने जम्मू प्रांत के गैर-वन भूमियों पर उगे खैर वृक्षों का आकलन करने का कार्य हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला (रूपये 57.50 लाख रूपये की कुल लागत पर) सौंपा गया तहत नि: शुल्क निकासी जलग्रहण उपचार काम करता है के लिए योजना अलग प्रावधान में, पर्यावरण सेवाएं प्रदान करने के लिए समर्थन बुनियादी ढांचे की लागत, ईंधन की लकड़ी की बचत उपकरणों, प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रमों, उपयोगकर्ता समूहों, प्रलेखन की लामबंदी, निगरानी और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए प्रावधान, प्रावधान के कार्यान्वयन , नमी हस्तक्षेप, वैन और जल संचयन संरचना, वन्यजीव प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण योजना, क्षमता निर्माण, आदि के निर्माण के लिए बनाया गया हैतहत नि: शुल्क निकासी जलग्रहण उपचार काम करता है के लिए योजना अलग प्रावधान में, पर्यावरण सेवाएं प्रदान करने के लिए समर्थन बुनियादी ढांचे की लागत, ईंधन की लकड़ी की बचत उपकरणों, प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रमों, उपयोगकर्ता समूहों, प्रलेखन की लामबंदी, निगरानी और मूल्यांकन गतिविधियों के लिए प्रावधान, प्रावधान के कार्यान्वयन , नमी हस्तक्षेप, वैन और जल संचयन संरचना, वन्यजीव प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण योजना, क्षमता निर्माण, आदि के निर्माण के लिए बनाया गया है। उपरोक्त कार्य हेतु जम्मू-कश्मीर वन विभाग और हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान के मध्य दिनांक 18॰05॰2011 को समझौता ज्ञापन भी हस्ताक्षरित किया गया । हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान ने उपरोक्त कार्य उपयुक्त वैज्ञानिक प्रणाली विकसित करते हुए भारतीय वन सर्वेक्षण और भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून के सहयोग से किया। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम के वैज्ञानिक तथा फील्ड कर्मचारियों ने प्रतिकूल मौसम तथा अन्य विषम परिस्थितयों के बावजूद सर्वेक्षण कार्य समय बद्ध तरीके से पूरा किया। फील्ड सर्वेक्षण के दौरान जम्मू-कश्मीर वन विभाग के फील्ड कर्मचारी,कर्मचारियों तथा स्थानीय नंबरदारों का सहयोग भी लिया गया । अंतिम रिपोर्ट स्वीकृत हो चुकी है और संबंधित प्राधिकारियों द्वारा इस कार्य को प्रशंसा भी की गई है।

5.शोंग-ठोंग कढ़छम जलविद्युत परियोजना जिला किन्नौर हिमाचल प्रदेश के लिए कैट योजना का पुनः मसौदा तैयार करना:


यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला को हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा जून 2012 में रू 5॰60 लाख की कीमत पर प्रदान की गई थी। फील्ड अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा किया गया तथा इससे संबंधित डाटा एकत्र एवं संकलित किया गया । मसौदा रिपोर्ट 31 जुलाई 2012 को परामर्षी संगठन को अनुरोध सहित प्रस्तुत की है कि इसे डी.एफ.ओ किन्नौर को उनके अवलोकन एवं टिप्पणियों के लिए अग्रेषित किया जाए। सी.सी.एफ रामपुर ने मसौदा रिपोर्ट पर कुछ सुझाव/ टिप्पणियां की हैं। सुझावों को मसौदा जलग्रहण क्षेत्र योजना में सम्मिलित कर लिया गया है। इसके बाद इसे अतिरिक्त प्रधान मुख्य अरण्यपाल (कैट योजना) हिमाचल प्रदेश वन विभाग को अनुमोदन के लिए भेजा गया था। कैट जलग्रहण क्षेत्र योजना को विधिवत् अनुमोदन प्रधान मुख्य-अरण्यपाल, हिमाचल प्रदेश से प्राप्त हुआ और अंतिम जलग्रहण क्षेत्र योजना की दस प्रतियां तथा सी.डी. में साफ्ट प्रतियों सहित परामर्शी संगठन को प्रस्तुत कर दी गई है ।

ब॰ आइ.सी.एफ.आर.ई के सहयोग से क्रियान्वित की गई कंस्लटेंसी:


1. रेणुका डैम जलविद्युत परियोजना जिला सिरमौर हि.प्र के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन व पर्यावरण प्रबंधन योजना पर अध्ययन:

हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पूर्व में के.के.पी.सी.एल के नाम से पहचान) ने रेणुका डैम जल-विद्युत परियोजना, जिला सिरमौर, हि.प्र के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करने का कार्य भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद, देहरादून को वर्ष 2007 के दौरान सौंपा। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान तथा मै. मेनटेक कंस्लटेंट, नई दिल्ली के सहयोग से उपरोक्त कार्य लिया तथा सौंपा गया कार्य वर्ष 2009 के दौरान पूरा कर लिया। पुष्प-वनस्पतिय तथा वन्यजीव प्रबंधन से संबंधित अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान द्वारा किया गया तथा हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान द्वारा किया गया तथा उपरोक्त से सम्बंधित प्रतिवेदन भारतीय वानिकी अनुसन्धान एवं शिक्षा परिषद, देहरादून को आगामी कार्रवाई हेतु प्रदान कर दिया गया है

2. नाक्थान जलविद्युत परियोजना( (400मेगावाट), जिला कुल्लू, हि.प्र के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन पर अध्ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करना:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कार्पोरेषन लिमिटेड द्वारा फरवरी 2010 में सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने पुष्प-वनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला को सौंपा। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के ई.आई.ए प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत की गई।

3.जिप्सा जलविद्युत परियोजना (300मेगावाट), जिला लाहौल-स्पिति, हि.प्र के लिए पर्यावरण संघात आकलन पर अध्ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करना:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कार्पोरेषन लिमिटेड द्वारा फरवरी, 2010 के दौरान सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद और हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला यह कार्य कर रहे हं। कार्य-सत्र के दौरान समाजार्थिक संबंधी डाटा एकत्र किया गया और म्डच् से संबंधित फील्ड अध्ययन जून/ जुलाई 2011 के दौरान किया गया और रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के पर्यावरण प्रबंधन प्रभाग में प्रस्तुत की गई है। कुछ प्रषासनिक कारणों से फिलहाल अध्ययन स्थगित कर दिया गया है।

4.थाना-प्लान जलविद्युत परियोजना (141मेगावाट), जिला हमीरपुर, हि.प्र के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन पर अध्ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करना:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कार्पोरेषन लिमिटेड द्वारा फरवरी 2010 में सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने पुष्प-वनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन एच.एफ.आर.आई शिमला को सौंपा। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के पर्यावरण प्रबंधन प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत कर दी गई है ।

5.बेरी-निचली जलविद्युत परियोजना (78 मेगावाट) जिला हमीरपुर हि.प्र के लिए पर्यावरण संघात आकलन पर अध्ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करना:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद, देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा फरवरी 2010 में सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने पुष्पवनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला को सौंपा। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के ई.एम प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत कर दी गई है ।

6॰ सुरगानी-सुंडला जलविद्युत परियोजना (42मेगावाट) जिला चंबा हि.प्र के लिए पर्यावरण संघात आकलन पर अध्ययन व पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करना:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा फरवरी2010 में सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने पुष्प-वनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला को सौंपा। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा लिए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के ई.एम प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत कर दी गई है

7॰ कुठेर जलविद्युत परियोजना जिला चंबा हि.प्र. के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रतिपादन की तैयारी:

यह कंस्लटेंसी मुख्य रूप से भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद देहरादून को मै. हिमाचल प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा फरवरी 2010 मंि सौंपी गई थी। भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद ने पुष्प-वनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला को सौंपा। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा लिए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के ई.आई.ए प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत कर दी गई है ।

8. हिमाचल प्रदेश में सतलुज बेसिन के लिए संचयी पर्यावरण संघात आकलन अध्ययन:

ऊर्जा निदेशालय, हिमाचल प्रदेश सरकार, शान्ति भवन, शिमला -171009 ने “हिमाचल प्रदेश में सतलुज बेसिन के लिए संचयी पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन” पर रू0 291॰94 राषि का कार्य सौंपा है। आई.सी.एफ.आर.ई ने पुष्प-वनस्पतिय व समाजार्थिक से संबंधित अध्ययन एच.एफ.आर.आई शिमला को आबंटित किया। इसके साथ निदेषक हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान को प्रोजैक्ट का स्थानीय समन्वयक भी नामित किया गया है । हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान की टीम द्वारा लिए गए अध्ययन के आधार पर मसौदा /आवधिक रिपोर्ट भारतीय वानिकी अनुसंधान संस्थान एवं शिक्षा परिषद के पर्यावरण प्रबंधन प्रभाग को अंतिम रूप देने व अंतिम रिपोर्ट में शामिल करने के लिए प्रस्तुत कर दी गई है ।

 

नवीन जानकारी


हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान,  शिमला में  दिनांक  21.06.2017 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उत्सव पर एक रिपोर्ट।     23.06.2017  


हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला  द्वारा  दिनांक 17.06.2017 को विश्व  मरु प्रसार रोक   दिवस   का आयोजन    23.06.2017  


हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान,  शिमला में दिनांक 01.06.2017 से 15.06.2017 तक  स्वच्छता   पाखवाड़ा पर एक रिपोर्ट।    23.06.2017


हिंदी कार्यशाला का संगठन     19.06.2017


प्रशिक्षु वन गार्ड्स ऑफ वन प्रशिक्षण संस्थान और रेंजर कॉलेज, सुंदरनगर, हिमाचल प्रदेश की एचएफआरआई, शिमला यात्रा।     19.06.2017


05 जून 2017 को  हिमालयन  वन अनुसंधान संस्थान,  शिमला में विश्व पर्यावरण दिवस के उत्सव पर एक रिपोर्ट।     07.06.2017


इथियोपिया के उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल की एचएफआरआई, शिमला की यात्रा पर एक रिपोर्ट दिनांक 17 मार्च, 2017.


स्थानीय किसानों के लिए काफल का नर्सरी स्टॉक तैयार करने विषय पर हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला में प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन दिनांक:27.2.2017.


हिमालयी वन वन संस्थान, शिमला में 20-21 फरवरी, 2017 को आयोजित "लनाबाका ग्राम, सिरमौर के किसानों के लिए प्राकृतिक रसीदों और जैविक खेती के स्थायी प्रबंधन के प्रति एकीकृत दृष्टिकोण" पर प्रशिक्षण कार्यक्रम पर एक रिपोर्ट .


“वानिकी में एकीकृत कीट. प्रबंधन एवं औषधीय पौधों के कीटों व बीमारियों का नियंत्रण “(16-18 फरवरी 2017) .


20 फरवरी, 2017 को एचएफआरआई, शिमला द्वारा आयोजित किसान मेला के उत्सव पर एक रिपोर्ट। .


एचएफआरआई शिमला में 12-18 फरवरी, 2017 तक राष्ट्रीय उत्पादकता सप्ताह - 2017 के उत्सव पर एक रिपोर्ट .



निदेशक का संदेश



डॉ. वी.पी. तिवारी, निदेशक, हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला का संबोधन:
हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान (हि.व.अ.सं), शिमला की वेबसाइट पर आपका स्वागत करते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है संस्थान, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर की वानिकी अनुसंधान आवश्यकताओं को संबोधित करता है संस्थान को परिषद द्वारा इन कठिन क्षेत्रों में पारिस्थितिक पुन: स्थापन में उच्च अनुसंधान हेतु शीत मरुस्थल पुन:स्थापन एवं चारागाह प्रबंधन उन्नत केंद्र का दर्जा दिया गया है  अधिक »

 

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